February 25, 2024

भारतीय नारी

नारी की भूमिका-

2. भारतीय नारी का स्वरूप-

भारतीय समाज में नारी का स्वरूप सम्माननीय रहा है, उसकी प्रतिष्ठा अर्धांगिनी के रूप में मान्य है। प्राचीन भारत में सर्वत्र नारी का देवीरूप पूज्य था। वैदिक काल में नर-नारी के समान अधिकार एवं समान आदर्श थे, परन्तु उत्तर-वैदिक काल में नारी की सामाजिक स्थिति में गिरावट आई। तत्पश्चात् मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन से भारतीय समाज में कठोर प्रतिक्रिया हुई। जिसके विषयशील घाट नारी को ही पिलाये। पर्दा प्रथा, जौहर प्रथा, सती प्रथा का उदय हुआ। समाज में अनैतिकता, कुरीतियों, कुप्रथाओं और रूढ़ियों ने पैर जमालिए। नारी की स्वतंत्रता के सभी मार्ग बंद किए गए।

वर्तमान युग में नारी-

उन्नीसवीं शताब्दी में ज्ञान-विज्ञान का प्रचार बढ़ने से भारतीय समाज-सुधारकों ने नारी की हीन अवस्था पर ध्यान दिया। उन्होंने सर्वप्रथम नारी की दशा में सुधार आवश्यक बतलाया। स्त्री-शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ। वर्तमान युग में हम नारी के दो रूप देखते हैं— (1) देहातों में रहने वाली नारी एवं (2) शहरों में रहने वाली महिलाएँ। देहातों में शिक्षा के अभाव में नारियाँ अभी भी सामाजिक कुरीतियों से ग्रस्त हैं। जबकि शहरों की नारियाँ पढ़ लिखकर सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। वर्तमान समय में नारी विविध क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रही हैं।

स्वतन्त्र भारत में नारी की भूमिका-

भारतीय नारी ने स्वतन्त्र भारत में जो प्रगति की है, उससे देश की उन्नति हो रही है, रहन-सहन का स्तर बढ़ रहा है। अब नारी पुरुष के समान राष्ट्रपति, मुख्यमन्त्री, मन्त्री, डॉक्टर, वकील, सी.ए., जज, शिक्षिका, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी, सैन्य अधिकारी आदि सभी पदों पर और सभी क्षेत्रों में कुशलता से काम कर रही हैं। सारे देश में नारी शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है। नारी सशक्तीकरण के अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। सार्वजनिक तथा सरकारी संस्थानों में नौकरी करने वाली महिलाओं की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। अब नारी समाज की राष्ट्र के विकास में भागीदारी बढ़ती जा रही है। यद्यपि नारियाँ अभी भी शोषण-उत्पीड़न से ग्रस्त हैं, परन्तु शिक्षा के प्रसार से उनके भविष्य को सुधारने के प्रयास निरन्तर किये जा रहे हैं।

उपसंहार-

हमारे देश में प्राचीन काल में नारी को अतीव पूज्य स्थान प्राप्त था। पुराणों, इतिहास और धर्मग्रंथों में वर्णित कई कथाएं हैं जहां नारी को देवी, माता और पुज्य व्यक्ति के रूप में स्थान प्राप्त है। जैसे कि, माँ दुर्गा, माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी, और माँ काली को अपनी अद्वितीय शक्ति और महत्त्व के कारण पूजा जाता है।

परन्तु, मध्यकाल में नारी की सामाजिक स्थिति में गिरावट आयी। विवाह के जरिए स्त्री को माता, पत्नी और भार्या के रूप में मान्यता मिलती थी, लेकिन समाज में उच्चतर वर्ग के पुरुषों की कठोरता के चलते कुछ श्रेणियां और वर्ग स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आया। इसके परिणामस्वरूप, नारी को शिक्षा, स्वतंत्रता और सामाजिक सहभागिता से वंचित रखा गया।

जैसा कि तुमने उज्ज्वलता से उज्जवल इंधन बनाने की बात कही है, वैसे ही अगर समाज में नारी के प्रति ज्यादा समर्पण और समरसता विकसित की जाए, तो वह अव्यावहारिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करेगी, जिससे समाज और सम्राटों में सह-संचालन की स्थिति बनेगी।

राष्ट्रीय उत्थान में नारी की भूमिका सर्वमान्य है। वैसे भी आज के समय में महिलाएं सभी क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुकी हैं। वे आर्थिक, शिक्षा, प्रशासनिक, साहित्यिक, खेल, सैन्य और वैज्ञानिक क्षेत्र में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इससे न केवल उनका स्वयं का विकास हो रहा है, बल्कि इससे पूरे समाज और देश की उन्नति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा रहा है।
इसलिए, नारी की भूमिका, स्थान और सामर्थ्य का विकास समरथित करना महत्त्वपूर्ण है ताकि देश और समाज दोनों ही तरफ से समृद्धि की ओर बढ़ सकें।

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